नोएडा, ग्रेटर नोएडा, गाजियाबाद और एनसीआर में पिछले सालों में कई ऐसे मामले हुए हैं जब कई अंडर-कंस्ट्रक्शन प्रोजेक्ट्स फंड की कमी से अटक गए और बिल्डर दिवालिया हो गए. ऐसी स्थिति में लाखों रुपये लगाकर अपने घर को पाने के लिए भी लोगों को सालों इंतजार करना पड़ा, वहीं बहुत सारे लोग तो अभी भी फ्लैटों के इंतजार में हैं लेकिन रियल एस्टेट एक्सपर्ट्स की मानें तो को-डेवलपर पॉलिसी, कंपनी टेकओवर, रिवर्स इनसॉल्वेंसी और वैकल्पिक फंडिंग आदि कई चीजें हैं जो खरीदारों के लिए बेहद फायदेमंद हैं. आइए जानते हैं
प्रॉपर्टी खरीदना और इसमें पैसा निवेश करना जहां जबर्दस्त फायदे का सौदा है वहीं कई बार यह बहुत ज्यादा रिस्की भी हो जाता है. अंडर-कंस्ट्रक्शन प्रॉपर्टी में पैसा लगाने वाले लोग कई बार इंतजार करते रह जाते हैं और उनका फ्लैट उन्हें नहीं मिल पाता.नोएडा, ग्रेटर नोएडा, गाजियाबाद, और एनसीआर में ऐसे बहुत सारे मामले रियल एस्टेट सेक्टर में देखने को मिले हैं, जब लाखों रुपये निवेश करने के बाद भी लोग खाली हाथ रह गए और उन्हें अपने घर को पाने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ने में भी पैसा फूंकना पड़ा.
इन मामलों में देखा गया कि प्रोजेक्ट तो बीच में अटका ही बिल्डर भी दिवालिया घोषित हो गया. पिछले सालों में ऐसे कई प्रोजेक्ट्स स्टॉल्ड या अधूरे रह गए. वहीं कुछ मामले एनसीएलटी तक पहुंच गए. लेकिन घबराइए नहीं, अगर आपका फ्लैट भी किसी लटके प्रोजेक्ट में अटक गया है तो वो आपको मिल सकता है. हमारे एक्सपर्ट्स आपको आज बताएंगे कि वे कौन से तरीके हैं जिनसे आपका घर आपको मिल सकता है.
किसी भी रियल एस्टेट प्रोजेक्ट के फंसने या अधूरे रहने की शुरुआत आमतौर पर फंड फ्लो के रुकने से होती है. विकास प्राधिकरण का बकाया, गलत रणनीति के कारण घटती बिक्री, निर्माण व अन्य मदों में बढ़ता खर्च, बैंकों या एनबीएफसी से फंडिंग बंद होना, इन कारणों से प्रमोटर के लिए निर्माण जारी रखना मुश्किल हो जाता है. समय पर प्रोजेक्ट पूरा न होने से रेरा और उपभोक्ता फोरम में घर खरीदारों की शिकायतें बढ़ती हैं, जिससे पेनल्टी लगती है. दबाव बढ़ने के साथ-साथ निर्माण रुक जाता है और कई बार मामला एनसीएलटी तक पहुंच जाता है.
क्रेडाई वेस्टर्न यूपी के अध्यक्ष दिनेश गुप्ता बताते हैं कि स्टॉल्ड या अधूरे प्रोजेक्ट्स की सबसे बड़ी वजह फंड की कमी है, जिसके कई कारण हो सकते हैं. एक स्टेज के बाद या तो प्रोजेक्ट रिवाइवल के योग्य बचता है या फिर एनसीएलटी की ओर बढ़ जाता है. जरूरत इस बात की है कि ऐसे प्रोजेक्ट्स के लिए हर संभव उपाय किए जाएं, जिससे आसान फंडिंग के रास्ते खुलें और प्रोजेक्ट बनकर पूरे हो सकें.
मांग और कीमतों में उछाल से बदल जाती है तस्वीर
कोविड के बाद बीते दो-तीन वर्षों में रियल एस्टेट सेक्टर में अप्रत्याशित तेजी देखने को मिली. घरों की बढ़ती मांग और कीमतों में उछाल ने कई ऐसे प्रोजेक्ट्स को दोबारा व्यवहारिक बना दिया, जिन्हें पहले पूरा करना असंभव माना जा रहा था. चूंकि इन प्रोजेक्ट्स में आंशिक निर्माण पहले से हो चुका था, इसलिए नए प्रोजेक्ट्स की तुलना में इन्हें जल्दी पूरा किया जा सकता था. इसी वजह से डेवलपर्स और निवेशकों की रुचि स्टॉल्ड प्रोजेक्ट्स की ओर बढ़ी.
को-डेवलपर पॉलिसी है स्टॉल्ड प्रोजेक्ट्स की संजीवनी
अमिताभ कांत कमेटी की सिफारिशों में शामिल को-डेवलपर पॉलिसी स्टॉल्ड प्रोजेक्ट्स के लिए बेहद कारगर साबित हुई है. इस मॉडल में नया डेवलपर पुराने प्रमोटर के बकाया और देनदारियों को प्राधिकरण की शर्तों पर चुकाकर निर्माण अधिकार हासिल करता है.
इस पॉलिसी के तहत निराला इंडिया ने मोरफियस प्रतीक्षा, एनसीआर मोनार्क ने कॉसमॉस इंफ्रास्ट्रक्चर, ऐपेक्स फ्लोरल ने औरा बिल्डवेल, निम्बस रियल्टी ने सनवाल्ड जैसे प्रोजेक्ट्स में को-प्रोमोटर के रूप में जुड़कर परियोजनाओं को नई जान दी है. यह डेवलपर्स के स्तर पर होने वाला काम है.
कंपनी टेकओवर मॉडल
कई मामलों में स्टॉल्ड प्रोजेक्ट को बचाने का रास्ता पूरी कंपनी का अधिग्रहण होता है. इसमें नई रियल एस्टेट कंपनी शेयर ट्रांसफर या इक्विटी खरीद के जरिए पुराने डेवलपर की कंपनी को टेकओवर कर लेती है. रेनॉक्स ग्रुप ने इसी मॉडल के तहत निवास प्रमोटर्स का अधिग्रहण किया और रेनॉक्स थ्राइव प्रोजेक्ट लॉन्च किया था.
रेनॉक्स ग्रुप के चेयरमैन शैलेंद्र शर्मा कहते हैं, ‘कंपनी का अधिग्रहण ही लैंड बैंक के उपयोग का एकमात्र रास्ता था. हमने प्रोजेक्ट लॉन्च से पहले अथॉरिटी, बैंक, रेरा और होम बायर्स के सभी बकाया निपटाए. इससे न सिर्फ रोजगार पैदा हुआ, बल्कि पूरा रेवेन्यू साइकिल फिर से शुरू हुआ.’
कई बार समस्या पैसे से ज्यादा प्रबंधन और क्रियान्वयन की कमजोरियों की होती है. ऐसे मामलों में प्रोजेक्ट का संचालन नई मैनेजमेंट टीम को सौंपा जाता है. डिलीजेंट बिल्डर्स के अंतरिक्ष वैली प्रोजेक्ट को इसी मॉडल पर रिवाइव किया गया.
नई मैनेजमेंट के सीओओ लेफ्टिनेंट कर्नल अश्विनी नागपाल (सेवानिवृत्त) बताते हैं, ‘नई मैनेजमेंट ने बेहतर कार्यशैली से विकास प्राधिकरण का बकाया चुकाया, परियोजना में वर्तमान जरूरतों के अनुसार बदलाव किए, पुराने अलॉटियों को बेहतर रिफंड और सेटलमेंट प्लान दिया और नई यूनिट्स की बिक्री की, जिससे आज हम ओसी प्राप्त करने की स्टेज पर हैं.’
रेरा की धारा-8 व 15 के तहत परियोजना पुनर्वास
रेरा अधिनियम की धारा-8 व 15 के तहत लगभग 20 अधूरी परियोजनाओं को अन्य प्रमोटरों या आवंटियों के समूह को अधिकृत किया गया. इससे जेपी कैलिप्सो कोर्ट, जेपी नाइट कोर्ट, वसुंधरा ग्रांड जैसे प्रोजेक्ट पूरे हुए. जबकि ऐपेक्स स्प्लेंडर, ऐपेक्स एलिगेंट विले, मांगल्य नोविना ग्रीन्स, आईथम 62, यूटोपिया एस्टेट जैसे प्रोजेक्ट्स निर्माणाधीन हैं.
विजन बिजनेस पार्क के फाउंडर वैभव अग्रवाल कहते हैं कि कई ऐसे रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स हैं, जिनमें एक या दो टॉवर लंबे समय से अनुपयोगी पड़े रहते हैं. इन टॉवरों का रेनोवेशन और रीफर्बिशमेंट नए डेवलपर की तर्ज पर किया जा रहा है. यह प्रोजेक्ट रिवाइवल का प्रभावी तरीका है, जिससे डेवलपर का अटका प्रोजेक्ट पूरा होता है और बेहतर गुणवत्ता मिलने से बायर्स को सीधा लाभ मिलता है.
आमतौर पर एनसीएलटी में जाने के बाद किसी प्रोजेक्ट का पूरा होना मुश्किल माना जाता है, लेकिन कुछ अपवाद भी हैं. आरजी ग्रुप ने ग्रेटर नोएडा वेस्ट स्थित आरजी लग्जरी होम्स के लिए रिवर्स इनसॉल्वेंसी का आदेश हासिल किया और आज ओसी प्राप्त कर पजेशन की पेशकश कर रहा है.
आरजी ग्रुप के निदेशक हिमांशु गर्ग बताते हैं, ‘हमारी परियोजना पूर्ण करने की योजना को घर खरीदारों और आईआरपी का सहयोग मिला. हमने कठिन शर्तों पर भी वित्तीय संस्थान से फंड प्राप्त किया और आदेश मिलने के तीन साल में एनसीएलटी से प्रभावित फेज-1 के सभी नौ टावरों की 1918 यूनिट्स का ओसी हासिल किया.’
वैकल्पिक फंडिंग है नई राह
स्टॉल्ड प्रोजेक्ट्स को बैंक और एनबीएफसी आमतौर पर फंडिंग देने से बचते हैं. ऐसे में प्राइवेट और अल्टरनेट फंड्स अहम भूमिका निभा रहे हैं. हाल ही में लॉन्च हुआ एसजीआरई फंड ऐसे ही व्यवहारिक लेकिन फंड-विहीन प्रोजेक्ट्स में निवेश कर रहा है.
एसजीआरई फंड के प्रमोटर सुरेश गर्ग के अनुसार, ‘हम उन्हीं प्रोजेक्ट्स में निवेश करते हैं जो आर्थिक रूप से व्यवहारिक हों. कई मामलों में हम स्वामिह फंड की पात्रता के लिए पहले इक्विटी फंडिंग उपलब्ध कराते हैं.’